सार्कोइडोसिस

इनके द्वाराBirendra P. Sah, MD, FCCP, Upstate Medical University
द्वारा समीक्षा की गईRichard K. Albert, MD, Department of Medicine, University of Colorado Denver - Anschutz Medical
समीक्षा की गई/बदलाव किया गया संशोधित फ़र॰ २०२५
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सार्कोइडोसिस एक बीमारी है जिसमें शरीर के विभिन्न अंगों में इंफ्लेमेटरी सेल्स (ग्रेन्युलोमाज़) असामान्य रूप से एकत्रित हो जाती हैं।

  • सार्कोइडोसिस आमतौर पर 20 से 40 वर्ष की उम्र के लोगों में होता है, ज़्यादातर उत्तरी यूरोपीय या अफ़्रीकी मूल के अमेरिकी लोगों में।

  • इससे कई अंग प्रभावित हो सकते हैं, आमतौर पर फेफड़े।

  • आमतौर पर लोगों को खांसी होती है और सांस लेने में तकलीफ़ होती है, लेकिन कौन से अंग प्रभावित हुए हैं, इस आधार पर लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं।

  • निदान के लिए आमतौर पर छाती का एक्स-रे, कंप्यूटेड टोमोग्राफ़ी (CT) और आमतौर पर फेफड़े के ऊतक के नमूने का विश्लेषण (बायोप्सी) किया जाता है।

  • अधिकांश लोगों में उपचार नहीं करने पर धीरे-धीरे लक्षण कम हो जाते हैं।

  • ज़रूरत पड़ने पर कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स के साथ इलाज शुरू किया जाता है।

सार्कोइडोसिस का कारण अज्ञात है। यह प्रतिरक्षा प्रणाली की एक असामान्य प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप हो सकता है जो पर्यावरण में पाए जाने वाले किसी पदार्थ, जैसे मोल्ड या फफूंदी या किसी बैक्टीरिया के संपर्क में आने से होती है। वंशानुगत आनुवंशिक कारक भी एक भूमिका निभाते प्रतीत होते हैं। सार्कोइडोसिस आमतौर पर 20 और 40 आयु वर्ग के लोगों में होता है। सार्कोइडोसिस पूरी दुनिया में पाया जाता है, लेकिन उत्तरी यूरोपीय मूल के लोगों, विशेष रूप से स्कैंडिनेवियाई और अफ़्रीकी मूल के अमेरिकी लोगों में सबसे ज़्यादा आम है।

सार्कोइडोसिस में इंफ्लेमेटरी सेल्स का संग्रहण (ग्रेन्युलोमा) हो जाता है। यह रोग, प्राथमिक रूप से किसी एक फेफड़े में और लसीका ग्रंथियों में होता है, लेकिन ग्रेन्युलोमा किसी भी अंग में बन सकते हैं, जिनमें लिवर, आँखें, और त्वचा शामिल हैं, और कभी-कभी स्प्लीन, हड्डियों, जोड़ों, श्वसन तंत्र के ऊपरी हिस्से (जैसे कि साइनस), स्केलेटल मांसपेशियों, किडनी, हृदय, प्रजनन अंगों, लार ग्रंथियों, और तंत्रिका तंत्र में भी बन सकते हैं। ग्रेन्युलोमा अंततः पूरी तरह से गायब हो सकते हैं या निशान ऊतक बन सकते हैं।

सार्कोइडोसिस विशेष सिंड्रोम के रूप में प्रकट हो सकता है।

लोफ़ग्रेन सिंड्रोम

लोफ़ग्रेन सिंड्रोम 3 विशिष्ट लक्षणों के रूप में प्रकट होता है: कई जोड़ों में तीव्र सूजन (अर्थराइटिस), जो अलग-अलग समय पर अलग-अलग जोड़ों को प्रभावित कर सकती है, त्वचा के नीचे लाल या रंगहीन कोमल उभार (एरिथेमा नोडोसम) और लसीका ग्रंथियों का उस क्षेत्र में बड़ा हो जाना, जहां फेफड़े, हृदय और सांस की नली से जुड़े हुए होते हैं। इसकी वजह से अक्सर बुखार आता है और मेलेइस हो जाता है, आँख की परत में सूजन (यूवेआईटिस) और कभी-कभी पैरॉटिड ग्रंथियों (लार ग्रंथियों की जोड़ी जो जबड़े के कोण के ठीक पीछे, कान के नीचे और सामने होती है) में सूजन आ जाती है। यह यूरोपियन वंश की महिलाओं, खासतौर पर स्कैंडिनेवियाई वंश की महिलाओं में सबसे आमतौर पर होता है।

लोफ़ग्रेन सिंड्रोम अक्सर अपने आप ही ठीक हो जाता है। लेकिन लक्षणों और जलन से राहत के लिए पीड़ित को बिना स्टेरॉइड वाली जलन रोकने वाली दवाएँ दी जा सकती हैं।

हीरफ़ोर्ड्ट सिंड्रोम

हीरफ़ोर्ड्ट सिंड्रोम (इसे यूवेपैरॉटिड बुखार भी कहते हैं) पैरॉटिड ग्लैंड में सूजन (सूजन वाली कोशिकाओं में अंतःस्पदंन होने के कारण) के रूप में प्रकट होता है, इसमें आँखों में सूजन (यूवेआईटिस), क्रोनिक बुखार और कभी-कभी कमज़ोरी या चेहरे की तंत्रिका में लकवा हो सकता है। हीरफ़ोर्ड्ट सिंड्रोम अपने आप ठीक हो सकता है। उपचार में कॉर्टिकोस्टेरॉइड सहित, बिना स्टेरॉइड वाली सूजन-रोधी दवाएँ शामिल होती हैं।

ब्लाऊ सिंड्रोम

ब्लाऊ सिंड्रोम, सार्कोइडोसिस-जैसा विकार होता है, जो ऑटोसोमल प्रभावी तरीके से वंशानुगत होता है। ब्लाऊ सिंड्रोम के लक्षण 4 साल से कम आयु में दिखने लगते हैं। लक्षणों में आमतौर पर गठिया, त्वचा पर चकत्ते और यूवेआईटिस शामिल हैं। ब्लाऊ सिंड्रोम अक्सर अपने आप ही ठीक हो जाता है। लक्षणों में, आमतौर पर बिना स्टेरॉइड वाली सूजन-रोधी दवाओं से राहत मिलती है।

सार्कोइडोसिस के लक्षण

सार्कोइडोसिस से पीड़ित कई लोगों में इसके कोई लक्षण दिखाई नहीं देते हैं और विकार का पता छाती के एक्स-रे में चलता है, जो किसी अन्य कारण से लिया गया हो। अधिकांश लोगों में मामूली लक्षण होते हैं, जो बढ़ते नहीं हैं।

इसके होने की जगह और बीमारी के फैलने की सीमा के आधार पर सार्कोइडोसिस के लक्षण काफ़ी अलग हो सकते हैं, साथ ही यह आयु और लिंग के आधार पर अलग-अलग हो सकते हैं।

सामान्य

बुखार, थकान, छाती में अस्पष्ट रूप से होने वाला दर्द, बीमार महसूस करना (मेलेइस), भूख न लगना, वज़न में कमी, और जोड़ों में दर्द, लगभग एक तिहाई लोगों में समस्या के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। लसीका ग्रंथियों का बढ़ना सामान्य है लेकिन इसकी वजह से अक्सर कोई लक्षण नहीं होते हैं। पूरी बीमारी के दौरान बुखार और रात में पसीना आ सकता है।

फेफड़े

सार्कोइडोसिस से सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वाले अंग हैं फेफड़े। फेफड़े के हृदय से मिलने वाली जगह या सांस की नली (ट्रेकिया) के आगे साइड में बढ़ी हुई लसीका ग्रंथियां छाती के एक्स-रे में देखी जा सकती हैं। सार्कोइडोसिस से फेफड़े में सूजन आ जाती है जिसकी वजह से धीरे-धीरे दाग हो जाते हैं और सिस्ट बन जाता है। यह अच्छी बात है कि, ऐसे बढ़ने वाले दाग कभी-कभी ही होते हैं। कभी-कभी, फ़ंगस ऐस्पर्जिलस (कोलोनाइज़) फेफड़े के सिस्ट में हो जाते हैं, वहीं बढ़ते हैं और उनमें रक्त स्राव होने लगता है। सांस लेना कठिन हो सकता है। फेफड़े में गंभीर रूप से सार्कोइडोसिस होने पर हृदय के दाहिने भाग में धीरे-धीरे खिंचाव हो सकता है, जिसकी वजह से हृदय का दायां भाग काम करना बंद कर देता है (कॉर पल्मोनेल)।

त्वचा

सार्कोइडोसिस से त्वचा बार-बार प्रभावित होती है। सार्कोइडोसिस अक्सर उभरे हुए, कोमल, लाल (या रंगहीन) उभार के साथ चकत्तों के रूप में शुरू होता है, जो आमतौर पर पिंडलियों पर होता है (एरिथेमा नोडोसम), जिसके साथ अक्सर बुखार और जोड़ों में दर्द होता है। चकत्ते 3 से 6 महीनों में ठीक हो जाते हैं, लेकिन फिर से भी आ सकते हैं। अफ़्रीकी मूल के अमेरिकियों में यह कम आम है।

सार्कोइडोसिस की वजह से त्वचा में होने वाले सामान्य घावों में छोटे उभार (जिसे पापुल्स कहते हैं) और बड़े उभार (जिसे नॉड्यूल्स कहते हैं) शामिल हैं। लंबे समय तक सार्कोइडोसिस होने पर चपटे पैचेस, उभरे पैचेस (प्लाक) या ऐसे प्लाक बन सकते हैं, जिनसे नाक, गाल, होंठ या कानों का रंग बदल सकता है (ल्यूपस पेर्नियो)। त्वचा पर बनने वाले पैचेस का रंग त्वचा के रंग से गहरा या हल्का हो सकता है। ल्यूपस पेर्नियो अश्वेत लोगों में सबसे आम है। ल्यूपस पेर्नियो से पीड़ित लोगों को नाक के मार्ग में ग्रेन्युलोमा हो सकता है, जिसकी वजह से साइनुसाइटिस जैसे लक्षण हो सकते हैं।

सार्कोइडोसिस का प्रकट होना
एरिथेमा नोडोसम

इस फ़ोटो में बैंगनी रंग का उभार (नॉड्यूल्स) दिखाया गया है, जो कि एरिथेमा नोडोसम की वजह से हुआ है।

इस फ़ोटो में बैंगनी रंग का उभार (नॉड्यूल्स) दिखाया गया है, जो कि एरिथेमा नोडोसम की वजह से हुआ है।

तस्वीर थॉमस हबीफ, MD द्वारा प्रदान की गई है।

सार्कोइडोसिस (नॉड्यूल्स)

इस इमेज में सार्कोइडोसिस से पीड़ित व्यक्ति में त्वचा नॉड्यूल्स को दिखाया गया है।

इस इमेज में सार्कोइडोसिस से पीड़ित व्यक्ति में त्वचा नॉड्यूल्स को दिखाया गया है।

इमेज डॉ. कैरेन मैकॉय, MD के सौजन्य से।

सार्कोइडोसिस (पेपुलर)

इस इमेज में सार्कोइडोसिस से पीड़ित व्यक्ति के होंठों पर कई छोटे, उभार दिखाई दे रहे हैं।

इमेज डॉ. कैरेन मैकॉय, MD के सौजन्य से।

इस इमेज में सार्कोइडोसिस से पीड़ित व्यक्ति के होंठों पर कई छोटे, उभार दिखाई दे रहे हैं।

इमेज डॉ. कैरेन मैकॉय, MD के सौज

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सार्कोइडोसिस (पैर)

सार्कोइडोसिस से पीड़ित व्यक्ति के शरीर के वे हिस्से जहाँ त्वचा का रंग बदल गया है और नॉड्यूल्स मौजूद हैं।

इमेज डॉ. कैरेन मैकॉय, MD के सौजन्य से।

सार्कोइडोसिस से पीड़ित व्यक्ति के शरीर के वे हिस्से जहाँ त्वचा का रंग बदल गया है और नॉड्यूल्स मौजूद हैं।

इमेज डॉ. कैरेन

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लिवर और स्प्लीन

सार्कोइडोसिस से ग्रसित लोगों में से 12% तक के लिवर में ग्रेन्युलोमा हो जाते हैं। अक्सर इन ग्रेन्युलोमा के कोई लक्षण नहीं होते हैं और लिवर सामान्य तरीके से काम करता हुआ लगता है। हालांकि, लिवर के शामिल होने जैसे कोई लक्षण नहीं दिखाई देने पर भी रक्त की जांच से इस बात का पता लग सकता है कि इसकी वजह से लिवर पर असर पड़ा है या नहीं। लिवर के ठीक से काम नहीं करने पर त्वचा का पीला होना और आंखों में सफ़ेदी (पीलिया) आना, कम ही होता है।

कुछ लोगों में स्प्लीन का आकार भी बढ़ जाता है। स्प्लीन का आकार बढ़ने पर पीड़ित को पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द हो सकता है।

आँखें

सार्कोइडोसिस से ग्रसित लोगों में से 12% की आँखों पर असर पड़ता है, खासतौर पर अफ़्रीकी मूल के अमेरिकी और जापानी मूल के लोगों में।

यूवेआईटिस की वजह से आँखें लाल हो जाती हैं और उनमें दर्द होता है और देखने में दिक्कत होती है। लंबे समय तक रहने वाली सूजन और जलन की वजह से फ़्लूड को आँखों में से निकलने में अवरोध उत्पन्न हो सकता है, जिसकी वजह से ग्लूकोमा हो जाता है, जिससे अंधापन हो सकता है। ग्रेन्युलोमा, नेत्रगोलक (आईबॉल) की झिल्ली में और पलकों के अंदर (कंजक्टिवा) भी बन सकता है। ऐसे ग्रेन्युलोमा के अक्सर कोई लक्षण नहीं होते हैं, लेकिन कंजक्टिवा तक पहुंचना आसान होता है और इसमें से डॉक्टर जांच के लिए ऊतक के नमूने ले सकते हैं। सार्कोइडोसिस से पीड़ित कुछ लोगों की आंखें सूखी, पीड़ादायक और लाल हो जाती हैं, ऐसा इसलिए होता है चूंकि इस विकार की वजह से आँसू की ग्रंथियाँ प्रभावित होती हैं और अब वे आंखों को चिकना बनाए रखने के लिए पर्याप्त आँसू नहीं बना पाती हैं।

हृदय

हृदय में बनने वाले ग्रेन्युलोमा की वजह से घबराहट हो सकती है, चक्कर आ सकते हैं या दिल का दौरा पड़ सकता है। सार्कोइडोसिस की वजह से फेफड़े के गंभीर रूप से प्रभावित होने पर दाहिनीं ओर का हृदय काम करना बंद कर सकता है (इसे कॉर पल्मोनेल कहते हैं), हृदय से फेफड़ों तक रक्त ले जाने वाली धमनी में ब्लड प्रेशर अधिक होने (पल्मोनरी हाइपरटेंशन) की वजह से ऐसा होता है। हृदय के इलेक्ट्रिकल कंडक्टिंग सिस्टम के पास बनने वाले ग्रेन्युलोमा की वजह से दिल की धड़कनों में संभावित रूप से जानलेवा अनियमितताएँ हो सकती हैं।

जोड़, मांसपेशियाँ और हड्डियाँ

सूजन और जलन की वजह से जोड़ों में काफ़ी दर्द हो सकता है। आमतौर पर कलाई, कोहनी, घुटने और एड़ियों के जोड़ों पर इसका सबसे ज़्यादा असर पड़ता है। हड्डियों में सिस्ट बन जाते हैं और इसकी वजह से आस-पास के जोड़ों में सूजन आ जाती है और वे नरम पड़ जाते हैं। कभी-कभी पीड़ित की मांसपेशियाँ भी कमज़ोर हो जाती हैं।

तंत्रिका तंत्र

सार्कोइडोसिस, क्रेनियल नसों (सिर की नसें) को प्रभावित कर सकता है, जिसकी वजह से दोहरा दिख सकता है, सुनने में दिक्कतें हो सकती हैं या चेहरे का एक हिस्सा लटक सकता है। अगर पिट्यूटरी ग्लैंड या इसके आस-पास की हड्डियों पर असर पड़ता है, तो आर्गिनिन वेसोप्रैसिन की कमी (सेंट्रल डायबिटीज इन्सीपिडस) हो सकती है। आर्गिनिनवेसोप्रैसिन की कमी से पिट्यूटरी ग्रंथि वेसोप्रैसिन का उत्पादन बंद कर देती है, जो मूत्र को गाढ़ा बनाने के लिए किडनी के लिए ज़रूरी हार्मोन है, जिसके कारण मूत्र का उत्पादन बढ़ जाता है।

कैल्शियम की अधिक मात्रा

सार्कोइडोसिस की वजह से रक्त और यूरिन में कैल्शियम का स्तर बढ़ सकता है। कैल्शियम का स्तर इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि सार्कोइड ग्लूकोमा सक्रिय विटामिन D बनाते हैं, जिसकी वजह से आँतें कैल्शियम को अधिक मात्रा में अवशोषित करने लगती हैं। रक्त में कैल्शियम का स्तर बढ़ने की वजह से भूख नहीं लगती है, मितली आती है, उल्टी होती है, प्यास लगती है और अधिक मात्रा में पेशाब बनने लगती है। कुछ लोगों के रक्त में कैल्शियम का स्तर सामान्य होने के बावजूद, उनके मूत्र में कैल्शियम उत्सर्जन का स्तर ज़्यादा हो सकता है। मूत्र में ज़्यादा कैल्शियम होने की जांच के लिए 24 घंटे के मूत्र के नमूने की ज़रूरत होती है। रक्त में कैल्शियम का स्तर लंबे समय तक अधिक रहने पर किडनी स्टोन्स हो सकता है या किडनी में कैल्शियम जमा हो सकता है और धीरे-धीरे किडनी से जुड़ी कोई क्रोनिक बीमारी हो सकती है।

सार्कोइडोसिस का निदान

  • छाती की इमेजिंग

  • बायोप्सी

डॉक्टर अक्सर उस स्थिति में सार्कोइडोसिस होने का संदेह करते हैं, जब उन्हें इससे संबंधित कुछ विशेष बदलाव देखने को मिलते हैं, इसमें छाती के एक्स-रे या कंप्यूटेड टोमोग्राफ़ी (CT) में बढ़ी हुई लसीका ग्रंथियां और असामान्य नतीजे मिलना शामिल है।

इसके बाद के परीक्षण करना आवश्यक होता है, खासतौर पर उस प्रभावित अंग के ऊतक के नमूने का माइक्रोस्कोपिक परीक्षण (बायोप्सी), जिसमें सूजन और ग्रेन्युलोमा दिखाई दे रहे हैं, जिससे इसकी पुष्टि हो जाती है। अल्ट्रासाउंड-गाइडेड नीडल बायोप्सी से की जाने वाली ब्रोंकोस्कोपी 90% सटीक होती है और यह उन लोगों में की जाती है, जिनके फेफड़े प्रभावित हुए हैं। ऊतक के नमूनों के अन्य संभावित स्रोत हैं, त्वचा में असामान्यताएं, त्वचा के पास मौजूद बढ़ी हुई लसीका ग्रंथियां और कंजक्टिवा पर ग्रेन्युलोमा। आमतौर पर लिवर की बायोप्सी नहीं की जाती है क्योंकि लिवर ग्रेन्युलोमा किसी अन्य विकार की वजह से भी हो सकते हैं और इसलिए हो सकता है कि बायोप्सी के ज़रिए पक्के तौर पर पता ना किया जा सके।

इन लक्षणों वाले लोगों में जिस भाग में लक्षण मिल रहे हैं, उसके आधार पर कार्डियक मैग्नेटिक रीसोनेंस इमेजिंग (MRI), मस्तिष्क या स्पाइन का MRI, हड्डियों के स्कैन और इलेक्ट्रोमायोग्राफ़ी की जाती है।

ट्यूबरक्लोसिस, में भी सार्कोइडोसिस के समान ही लक्षण मिलते हैं। समस्या ट्यूबरक्लोसिस है या सार्कोइडोसिस है, यह पता लगाने में मदद करने के लिए डॉक्टर ट्यूबरकुलिन त्वचा परीक्षण भी करते हैं (कभी-कभी फेफड़े की बायोप्सी भी करते हैं)।

अन्य विधियाँ जिनसे डॉक्टर को सार्कोइडोसिस का पता लगाने या उसकी गंभीरता का आंकलन करने में मदद मिल सकती है, उनमें शामिल हैं फेफड़ों में पानी डालना (ब्रोंकोएल्विओलर लैवेज) और उस फ़्लूड का परीक्षण करना। सक्रिय सार्कोइडोसिस वाले लिवर के फ़्लूड में बहुत सारे लिम्फ़ोसाइट्स होते हैं, लेकिन ऐसा सिर्फ़ सार्कोइडोसिस में ही नहीं होता है। इसके अलावा भी अन्य परीक्षण, जो कभी-कभी किए जाते हैं, वे हैं पोज़ीट्रॉन एमिशन टोमोग्राफ़ी (PET) स्कैनिंग, इससे सार्कोइडोसिस से प्रभावित छोटे से क्षेत्र का भी पता लग सकता है, जो फेफड़े के अलावा भी शरीर के अन्य अंगों पर असर डालते हैं।

फेफड़े में निशान वाले लोगों में पल्मोनरी फ़ंक्शन परीक्षण में यह दिख सकता है कि फेफड़ों द्वारा होल्ड की जाने वाली हवा की मात्रा सामान्य से कम है। फेफड़े कितने गंभीर तरीके से प्रभावित हुए हैं, इसका पता लगाने में मदद करने के लिए 6-मिनट तक पैदल चलने का एक परीक्षण किया जा सकता है।

रक्त की जांचों में सफेद रक्त कोशिकाओं, लाल रक्त कोशिकाओं या कभी-कभी प्लेटलेट्स की कम संख्या मिल सकती है। खासतौर पर अश्वेतों में अक्सर इम्युनोग्लोबुलिन का स्तर अधिक होता है। रक्त या पेशाब में कैल्शियम का स्तर बढ़ सकता है। अगर लिवर प्रभावित हुआ है, तो लिवर एंज़ाइम खासतौर पर एल्केलाइन फ़ॉस्फेटेज़ का स्तर बढ़ सकता है।

सार्कोइडोसिस का इलाज

  • बिना स्टेरॉइड वाली एंटी-इंफ्लेमेटरी दवाएँ

  • कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स

  • प्रतिरक्षा प्रणाली को दबाने वाली अन्य दवाइयां

सार्कोइडोसिस से पीड़ित अधिकांश लोगों को इलाज की ज़रूरत नहीं होती है।

पीड़ित को दर्द या बुखार जैसे लक्षणों से राहत देने के लिए बिना स्टेरॉइड वाली जलन कम करने वाली दवाएँ दी जा सकती हैं।

सार्कोइडोसिस को दबाने के लिए कॉर्टिकोस्टेरॉइड दी जाती हैं जिनकी वजह से सांस में तकलीफ़, जोडों या छाती में दर्द और बुखार जैसे लक्षण होते हैं। ये दवाइयां भी दी जाती हैं, अगर

  • भले ही लक्षण मामूली हों, लेकिन जांचों में रक्त में कैल्शियम का स्तर अधिक पाया गया हो।

  • जब हृदय, लिवर या तंत्रिका तंत्र ठीक से कार्य नहीं कर रहे हों।

  • सार्कोइडोसिस की वजह से त्वचा पर विकृति वाले घाव हो जाते हैं या आँखों में बीमारी हो जाती है, जो कॉर्टिकोस्टेरॉइड आई ड्रॉप से ठीक नहीं होती है।

  • फेफड़े की बीमारी और गंभीर हो जाती है।

कॉर्टिकोस्टेरॉइड की मदद से सार्कोइडोसिस की वजह से होने वाले ऊतक नुकसान को अस्थायी रूप से कम किया जा सकता है और यह लक्षणों को अच्छी तरह से नियंत्रित करते हैं, लेकिन हो सकता है कि इससे फेफड़े में होने वाले निशानों को कई सालों के लिए न रोक सकें। कॉर्टिकोस्टेरॉइड से उन लोगों को भी मदद मिल सकती है, जिनके रक्त या पेशाब में कैल्शियम की बहुत अधिक मात्रा हो।

जिन लोगों के रक्त में कैल्शियम का स्तर ज़्यादा होता है, उन्हें कम कैल्शियम वाला आहार लेने, ज़्यादा मात्रा में तरल पदार्थ पीने, और धूप में कम से कम रहने की भी ज़रूरत हो सकती है।

अगर कॉर्टिकोस्टेरॉइड कारगर नहीं होते हैं या उनके कारण कष्टदायक दुष्प्रभाव होते हैं, तो प्रतिरक्षा प्रणाली को दबाने वाली अन्य दवाइयां दी जाती हैं। इन दवाओं में मीथोट्रेक्सेट, एज़ेथिओप्रीन, माइकोफ़ेनोलेट, साइक्लोफ़ॉस्फ़ामाइड, हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन और लेफ़्लुनोमाइड शामिल हो सकती हैं।

हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन का उपयोग ज़रूरत पड़ने पर त्वचा के विकृत होने वाले घावों, रक्त में कैल्शियम का स्तर अधिक होने और कुछ बढ़ी हुई, असुविधाजनक या विकृत लसीका ग्रंथियों के इलाज के लिए किया जाता है।

कुछ लोगों का उपचार इन्फ़्लिक्सीमेब से किया जाता है, खासकर उन लोगों का, जिनमें कॉर्टिकोस्टेरॉइड और प्रतिरक्षा प्रणाली को दबाने वाली अन्य दवाई अप्रभावी रहती है। वे लोग जिनका इलाज इन्फ़्लिक्सीमेब से किया जा चुका है लेकिन अब इन्फ़्लिक्सीमेब के दुष्प्रभाव की वजह से वे इसे और नहीं ले सकते हैं, उन्हें डॉक्टर अब एडैलिमुमेब दे सकते हैं।

अगर हृदय पर इसका प्रभाव पड़ा है, तो पीड़ित को इंप्लांट करने लायक कार्डियक डिफ़िब्रिलेटर और पेसमेकर की ज़रूरत पड़ सकती है।

अगर सार्कोइडोसिस की वजह से फेफड़े, हृदय या लिवर गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं, तो कभी-कभी इन्हें ट्रांसप्लांट किया जाता है, लेकिन ट्रांसप्लांट किए गए अंग में सार्कोइडोसिस फिर से हो सकता है।

छाती के एक्स-रे, CT, पल्मोनरी फ़ंक्शन जांचें और रक्त में कैल्शियम की मात्रा को मापकर उपचार के सफल होने के बारे में पता लगाया जा सकता है। इलाज खत्म होने के बाद रिलेप्सेस का पता लगाने के लिए ये जांचें नियमित तौर पर की जाती हैं।

जिन लोगों को फेफड़े का मध्यम या गंभीर सार्कोइडोसिस है और उनका उपचार, प्रतिरक्षा प्रणाली को दबाने वाली दवाइयों से किया जाता है, तो उनमें इन्फ़्लूएंज़ा, श्वसन तंत्रीय सिंसीटियल वायरस [RSV] और कोविड-19 के साथ-साथ न्यूमोकोकल निमोनिया जैसे गंभीर वायरल संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। सार्कोइडोसिस से ग्रसित इन लोगों के लिए इन संक्रमणों के खिलाफ वैक्सीन की दृढ़ता से सिफ़ारिश की जाती है, क्योंकि ये टीके मृत्यु के जोखिम और बीमारी की गंभीरता को कम कर सकते हैं।

सार्कोइडोसिस का पूर्वानुमान

फेफड़े के सार्कोइडोसिस से ग्रसित लोगों में से लगभग दो तिहाई लोगों में सार्कोइडोसिस में अपने आप सुधार हो जाता है या वह साफ़ हो जाता है। यहाँ तक कि छाती में बढ़ी हुई लसीका ग्रंथियां और फेफड़े में फैली सूजन भी कुछ ही महीनों या सालों में गायब हो सकती है। हालांकि, 30% तक लोगों में इसका चक्र क्रोनिक या धीरे-धीरे बढ़ने वाला होता है।

जिन लोगों की छाती में लसीका ग्रंथियां बढ़ी हुई हैं लेकिन फेफड़े की बीमारी का कोई और संकेत नहीं दिख रहा है, तो यह अच्छी बात होती है। लोफ़ग्रेन सिंड्रोम वाले लोगों में अक्सर इन रोगों की कोई संभावना नहीं होती है। जिन लोगों को एक बार सार्कोइडोसिस होता है, उनमें से लगभग 5% लोगों को यह फिर से हो जाता है।

जिन लोगों को एक बार भी सार्कोइडोसिस हुआ है, उनमें से लगभग 10 से 20% लोगों में गंभीर अक्षमता हो जाती है क्योंकि इसकी वजह से आंखों, श्वसन तंत्र या किसी अन्य अंग को नुकसान पहुंचता है। सार्कोइडोसिस से ग्रसित लोगों में से 10% से भी कम लोगों में यह जानलेवा होता है। फेफड़ों की गंभीर बीमारी के बाद, हृदय का गंभीर रूप से प्रभावित होना, मृत्यु का सबसे ज़्यादा आम कारण है।

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