छाती के इमेजिंग अध्ययनों में शामिल होते हैं:
एक्स-रे
कंप्यूटेड टोमोग्राफी (CT)
CT एंजियोग्राफ़ी
मैग्नेटिक रेज़ोनेंस इमेजिंग (MRI)
अल्ट्रासाउंड
फेफड़े की न्यूक्लियर स्कैनिंग
पोज़ीट्रॉन एमिशन टोमोग्राफ़ी (PET) स्कैनिंग
(फेफड़ों से संबंधित विकारों के लिए चिकित्सा इतिहास और शारीरिक परीक्षण और श्वसन तंत्र के विवरण के साथ-साथ इमेजिंग टेस्ट का विवरण भी देखें।)
मैग्नेटिक रीसोनेंस इमेजिंग (MRI) और अल्ट्रासाउंड को छोड़कर, इन सभी इमेजिंग अध्ययनों में, एक्स-रे के रूप में रेडिएशन का उपयोग होता है। छाती का एक्स-रे अक्सर तभी किया जाता है, जब डॉक्टर को फेफड़े या दिल में कोई समस्या होने का संदेह होता है। अन्य इमेजिंग टेस्ट आवश्यकतानुसार, डॉक्टर को सही बीमारी पहचानने में मदद करने के लिए किए जाते हैं।
चेस्ट एक्स-रे
छाती का एक्स-रे आमतौर पर पीछे से आगे की ओर लिया जाता है। आमतौर पर साइड से भी एक एक्स-रे लिया जाता है। कभी-कभी व्यक्ति को किसी अलग स्थिति में रखते हुए चेस्ट एक्स-रे लेने की ज़रूरत होती है, ताकि डॉक्टर फेफड़ों के किसी खास हिस्से को देख पाएं या ऐसा इसलिए भी होता है, क्योंकि व्यक्ति को सामान्य स्थिति में नहीं रखा जा सकता।
छाती के एक्स-रे से दिल और महत्वपूर्ण रक्त वाहिकाओं की स्थिति की सटीक जानकारी प्राप्त होती है, इससे फेफड़ों, उनके पास की जगह या दिल की दीवारों सहित पसलियों की गंभीर बीमारियों की पहचान की जा सकती है। उदाहरण के लिए, छाती के एक्स-रे में अधिकांश निमोनिया, फेफड़ों के ट्यूमर, क्रोनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी रोग (COPD), सिकुड़े हुए फेफड़े (एटेलेक्टेसिस) और प्लूरल स्पेस (फेफड़े और छाती की अंदरूनी दीवार को ढंकने वाले प्लूरा की 2 परतों के बीच की जगह) में भरी हवा (न्यूमोथोरैक्स) या फ़्लूड (प्लूरल इफ़्यूज़न) को देखा जा सकता है।
हालाँकि, छाती के एक्स-रे से असामान्यता का सटीक कारण जानने के लिए पर्याप्त जानकारी बहुत ही कम बार मिल पाती है, लेकिन इनसे डॉक्टर यह पता लगा सकते हैं कि क्या रोग का पता लगाने के लिए दूसरा कोई टेस्ट ज़रूरी है, अगर हाँ, तो कौन-सा।
चेस्ट की कंप्यूटेड टोमोग्राफ़ी (CT)
चेस्ट की कंप्यूटेड टोमोग्राफ़ी (CT) एक्स-रे प्रोसीजर का ऐसा प्रकार है जिसमें सामान्य एक्स-रे से ज़्यादा जानकारी मिलती है। CT में एक कंप्यूटर, एक्स-रे की एक सीरीज़ का विश्लेषण करता है, जिससे अलग-अलग प्लेन पर कई लंबवत और क्रॉस सेक्शनल इमेज उपलब्ध हो जाती हैं। CT के दौरान एक पदार्थ, जो कि एक्स-रे में देखा जा सकता है (जिसे रेडियोपैक कंट्रास्ट एजेंट कहा जाता है), उसे खून के बहाव में पहुंचाया जा सकता है या मुंह के ज़रिए दिया जाता है, जो छाती के कुछ असामान्य लक्षणों को समझने में मदद करता है।
हाई रिज़ॉल्यूशन CT और हेलिकल (स्पाइरल) CT अधिक विशिष्ट तरह की CT प्रक्रियाएँ हैं। हाई रिज़ॉल्यूशन CT फेफड़े की बीमारी की ज़्यादा जानकारी दे सकती है। हेलिकल CT से 3-आयामी इमेज मिल सकती हैं।
आमतौर पर व्यक्ति द्वारा गहरी सांस लेने के बाद, CT स्कैन किया जाता है। कभी-कभी सांस की छोटी नली को बेहतर ढंग से देखने के लिए, व्यक्ति द्वारा सांस लेते और छोड़ते समय CT इमेज ली जाती हैं।
चेस्ट की कंप्यूटेड टोमोग्राफ़ी (CT) एंजियोग्राफ़ी
CT एंजियोग्राफ़ी में एक ऐसे तरल का उपयोग किया जाता है, जो CT स्कैन पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है (रेडियोओपैक कंट्रास्ट एजेंट), जिसे बांह की शिरा में इंजेक्ट किया जाता है, जिससे रक्त वाहिकाओं की छवियां प्राप्त होती हैं, जिनमें वह धमनी भी शामिल है, जो हृदय से फेफड़ों तक रक्त ले जाती है (पल्मोनरी धमनी)।
पल्मोनरी धमनी में ब्लड क्लॉट (पल्मोनरी एम्बोलिज़्म) का पता लगाने के लिए, फेफड़ों की न्यूक्लियर स्कैनिंग के बजाय आमतौर पर, CT एंजियोग्राफ़ी की जाती है। हालाँकि, किडनी की बीमारी से पीड़ित व्यक्ति, जिसकी बीमारी कंट्रास्ट एजेंट के इस्तेमाल से बिगड़ सकती हो या जिसे कंट्रास्ट एजेंट से एलर्जी हो, उसकी CT एंजियोग्राफ़ी संभव नहीं होती।
चेस्ट की मैग्नेटिक रीसोनेंस इमेजिंग (MRI)
मैग्नेटिक रीसोनेंस इमेजिंग (MRI) से भी काफी अच्छी इमेज मिलती हैं जो खास तौर पर तब उपयोगी होती हैं, जब डॉक्टर को छाती में एओर्टिक एन्युरिज़्म जैसी खून की नली में असामान्यताओं की आशंका हो।
MRI कराने में ज़्यादा समय लगता है और यह कंप्यूटेड टोमोग्राफ़ी (CT) से ज़्यादा महँगी होती है। फेफड़ों में असामानताओं की पहचान करने के लिए CT की तुलना में MRI का रिज़ॉल्यूशन कम होता है, इसलिए छाती की इमेजिंग के लिए MRI का इस्तेमाल अक्सर कम ही किया जाता है। CT के विपरीत MRI में रेडिएशन का उपयोग नहीं किया जाता।
पेसमेकर या इम्प्लांट किए गए अन्य मेटल के डिवाइस वाले लोगों को MRI से पहले विशेष सावधानी बरतने की ज़रूरत हो सकती है।
छाती का अल्ट्रासाउंड
अल्ट्रासाउंड, शरीर में ध्वनि तरंगों के परावर्तन से एक तस्वीर तैयार होती है। अल्ट्रासाउंड का उपयोग अक्सर प्लूरल स्पेस (फेफड़े और छाती की अंदरूनी दीवार को ढंकने वाले प्लूरा की 2 परतों के बीच की जगह) में फ़्लूड का पता लगाने के लिए किया जाता है। फ़्लूड निकालने के लिए सुई का उपयोग करते समय, मार्गदर्शन के लिए भी अल्ट्रासाउंड का उपयोग किया जा सकता है।
प्वाइंट-ऑफ़-केयर अल्ट्रासाउंड, व्यक्ति के बिस्तर के पास ही की जाती है। यह कभी-कभी न्यूमोथोरैक्स का निदान करने के लिए की जाती है।
एंडोब्रोंकियल अल्ट्रासाउंड (EBUS) का उपयोग ब्रोंकोस्कोपी के साथ मिलाकर डॉक्टरों का मार्गदर्शन करने में मदद के लिए तब किया जा सकता है, जब उन्हें कैंसर का पता लगाने के लिए फेफड़ों के ऊतक का नमूना लेने (नीडल बायोप्सी) की ज़रूरत होती है। इस मामले में, सांस की नली के अंदरूनी हिस्सों की इमेज पाने के लिए ब्रोंकोस्कोप पर अल्ट्रासाउंड प्रोब स्थित होता है।
फेफड़े की न्यूक्लियर स्कैनिंग
फेफड़ों में ब्लड क्लॉट (पल्मोनरी एम्बोली) का पता लगाने के लिए फेफड़ों की न्यूक्लियर स्कैनिंग उपयोगी हो सकती है, लेकिन विकार का पता लगाने के लिए इसका स्थान काफ़ी हद तक CT एंजियोग्राफ़ी ने ले लिया है। फिर भी CT एंजियोग्राफ़ी संभव नहीं होने पर न्यूक्लियर फेफड़ों की स्कैनिंग की जा सकती है, क्योंकि किडनी की बीमारी से पीड़ित व्यक्ति की हालत CT में उपयोग होने वाले कंट्रास्ट एजेंट या कंट्रास्ट एजेंट की एलर्जी से बिगड़ सकती है। जिन लोगों के फेफड़े का हिस्सा फेफड़ों के कैंसर या गंभीर क्रोनिक अवरोधक फेफड़ा रोग (COPD) के इलाज के लिए निकाला गया है, उनकी सर्जरी से पूर्व की जांच के दौरान भी न्यूक्लियर फेफड़ों के स्कैनिंग का उपयोग किया जा सकता है, ताकि पता चल सके कि बचे हुए फेफड़े कितनी अच्छी तरह काम कर रहे हैं।
फेफड़ों का न्यूक्लियर वेंटिलेशन/परफ़्यूज़न स्कैन (V/Q स्कैन) बिना चीरे वाला और काफ़ी सटीक होता है, लेकिन इसमें CT एंजियोग्राफ़ी की तुलना में ज़्यादा समय लगता है। वेंटिलेशन/परफ़्यूज़न स्कैन असल में 2 स्कैन होते हैं, एक जो सांस (वेंटिलेशन) को मापता है और दूसरा रक्त के प्रवाह (परफ़्यूज़न) को मापता है। ये टेस्ट आम तौर पर साथ में किए जाते हैं लेकिन इन्हें अलग-अलग भी किया जा सकता है।
फेफड़ों के परफ़्यूज़न स्कैन के लिए, रेडियोएक्टिव पदार्थ की छोटी सी मात्रा को शिरा में इंजेक्ट किया जाता है, जो पल्मोनरी धमनी से फेफड़ों में जाता है, जहां वह फेफड़ों की रक्त आपूर्ति को रेखांकित करता है।
फेफड़ों के वेंटिलेशन स्कैन में व्यक्ति, नुकसान न पहुंचाने वाली एक गैस को सांस में लेता है, जिसमें रेडियोएक्टिव सामग्री की बहुत सूक्ष्म मात्रा होती है, जो फेफड़ों (एल्विओलाई) की छोटी-छोटी हवा की थैलियों में बंट जाती है। जिन जगहों पर कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ा जा रहा है और ऑक्सीजन लिया जा रहा है, उन्हें स्कैनर पर देखा जा सकता है।
इस वेंटिलेशन स्कैन की तुलना, परफ़्यूज़न स्कैन में दिखाए गए रक्त आपूर्ति के पैटर्न से करके, डॉक्टर आमतौर पर यह पता लगा सकते हैं कि क्या किसी व्यक्ति के एक या दोनों फेफड़ों में ब्लड क्लॉट हैं या नहीं।
पॉज़िट्रॉन एमिशन टोमोग्राफ़ी (PET)
कैंसर की आशंका होने पर पोज़ीट्रॉन एमिशन टोमोग्राफ़ी (PET) स्कैनिंग का उपयोग किया जाता है। रेडियोग्राफ़िक इमेजिंग तकनीक, सामान्य बिना कैंसर वाले ऊतकों की तुलना में हानिकारक कैंसर वाले ऊतकों की अलग-अलग चयापचय दरों पर निर्भर करती है। ग्लूकोज़ के अणुओं को एक ऐसे यौगिक के साथ मिलाया जाता है, जो PET का उपयोग करने पर दिखाई पड़ता है। इन अणुओं को नसों के माध्यम से शरीर के अंदर पहुँचाया जाता है, जो तेजी से चयापचय करने वाले ऊतक में (जैसे कैंसरयुक्त लसीका ग्रंथि में) इकट्ठे हो जाते हैं, ये ऊतक PET स्कैन में दिखाई देते हैं। मामूली ट्यूमर होने पर आमतौर पर इतने अणु मौजूद नहीं होते कि वे दिखाई दें।
PET स्कैन का उपयोग अक्सर कंप्यूटेड टोमोग्राफ़ी (CT) स्कैन के साथ, फेफड़ों के ट्यूमर को देखने के लिए किया जाता है।



