अधिकांश बच्चों को 2 से 3 साल की उम्र के बीच अपने मल त्याग पर नियंत्रण और 3 से 4 साल की उम्र के बीच दिन के समय अपने ब्लैडर पर नियंत्रित करने का प्रशिक्षण दिया जा सकता है। 5 वर्ष की आयु तक, अधिकांश बच्चे अकेले शौचालय का उपयोग कर सकते हैं और कपड़े पहनने, उतारने, मूत्र या शौच करने, पोंछने, फ्लश करने और हाथ धोने के सभी काम खुद कर सकते हैं।
हालाँकि, कुछ बच्चों को अपने मूत्राशय या आँत को नियंत्रित करने में परेशानी होती है। नियंत्रण की इस कमी को असंयम कहा जाता है। जिन बच्चों को अपने मूत्राशय को नियंत्रित करने में परेशानी होती है, उनके लिए बच्चों में युरिनरी इनकॉन्टिनेन्स देखें। उन बच्चों के लिए, जिन्हें अपनी आँत को नियंत्रित करने में परेशानी होती है, वे बच्चों में स्टूल इनकॉन्टिनेंस देखें।
बच्चे की तैयारी के संकेतों को पहचानना शौचालय शिक्षण की कुंजी है। तैयारी का संकेत तब मिलता है जब बच्चा:
कई घंटों तक पेशाब न करे
डायपर गीले या गंदे होने पर बदलना चाहता है
पॉटी चेयर या शौचालय पर बैठने में रुचि दिखाता है और पेशाब करने या शौच करने के लिए तैयार होने के संकेत दिखाता है
चीजों को वहां रख सके जहां उनका स्थान हो और सरल आदेशों का पालन कर सके
बच्चे आमतौर पर 18 महीने से 30 महीने की उम्र के बीच प्रशिक्षण शुरू करने के लिए तैयार होते हैं। शौचालय का उपयोग करने के लिए शारीरिक रूप से तैयार होने के बावजूद, कुछ बच्चे भावनात्मक रूप से तैयार नहीं हो पाते हैं। शौच के लिए लंबे संघर्ष से बचने के लिए, सबसे अच्छा यही होगा कि जब तक बच्चे भावनात्मक तैयारी का संकेत न दें, तब तक प्रतीक्षा करें। जब बच्चे तैयार हो जाते हैं, तो वे बाथरूम में मदद मांगेंगे या खुद पॉटी चेयर तक पहुंचेंगे।
शौचालय के उपयोग के प्रशिक्षण की दिनचर्या सभी देखभाल करने वालों के बीच सुसंगत होनी चाहिए। बेबीसिटर्स, दादा-दादी और चाइल्ड केयर वर्कर्स या आया को समान दिनचर्या का पालन करना चाहिए और शरीर के अंगों और बाथरूम में की जाने वाली क्रियाओंं के लिए समान नामों का उपयोग करना चाहिए।
टाइमिंग विधि बच्चे को धीरे-धीरे शौचालय का उपयोग करना सिखाती है। जो बच्चे शौचालय के उपयोग के लिए तैयार दिखाई देते हैं उन्हें पॉटी चेयर से परिचित कराया जाता है और धीरे-धीरे पूरी तरह से कपड़े पहने हुए उस पर बैठने के लिए कहा जाता है। इसके बाद बच्चों को अपनी पैंट नीचे करके, टॉयलेट चेयर पर बैठने का अभ्यास करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, यह भी सिखाया जाता है कि एक बार में 5 या 10 मिनट से अधिक नहीं बैठना चाहिए और उनमें सुधार किया जाता है। बार-बार सरल स्पष्टीकरण दिए जाते हैं और गीले या गंदे डायपर को पॉटी बाउल में रखकर उन्हें सुदृढ़ किया जाता है। बच्चों को यह भी बताया जाता है कि जब भी उन्हें जाने की आवश्यकता महसूस हो तो पॉटी का उपयोग करने का अभ्यास करें। उन्हें हर बार पेशाब या शौच करने पर फ्लश करने और हाथ धोने के बारे में सिखाया जाना चाहिए।
सफल व्यवहार के लिए प्रशंसा की जाती है या पुरस्कार (जैसे स्टिकर्स) दिया जाता है। दुर्घटनाओं या सफलता न मिलने पर गुस्सा होने या दंड देने से बचना चाहिए क्योंकि इससे बच्चे को सिखाने की प्रक्रिया नकारात्मक और अत्यधिक तनावपूर्ण बन जाएगी। माता-पिता को यह समझना और स्वीकार करना चाहिए कि टॉयलेट ट्रेनिंग में महीनों लग सकते हैं और इस दौरान बच्चे से अनजाने में गलतियां हो सकती हैं।
समय विधि उन बच्चों के लिए अच्छी तरह से काम करती है जिनका संडास और पेशाब का समय लगभग निश्चित होता है और जिन्हें संडास के सामान्य समय पर पॉटी चेयर पर बैठाया जा सकता है। जिन बच्चों का संडास और पेशाब का समय अनियमित होता है उनको देरी से सिखाना बेहतर हो सकता है जब तक कि वे खुद पॉटी चेयर पर जाने की आवश्यकता महसूस ना करने लगें।
अन्य तरीकों में बच्चे पर केंद्रित टॉयलेट ट्रेनिंग शामिल है, जिसमें टॉयलेट ट्रेनिंग के लिए बच्चे के संकेतों और गति का पालन करना शामिल है, और पुरस्कार-आधारित तरीके शामिल हैं, जो कुछ बच्चों में तेजी से काम कर सकते हैं।
एक बच्चा जो शौचालय में बैठने का विरोध करता है उसे भोजन के बाद फिर से प्रयास कराना चाहिए। यदि प्रतिरोध कई दिनों तक जारी रहता है, तो सिखाने की प्रक्रिया को कई हफ़्तों के लिए स्थगित करना सबसे अच्छा होता है। जो बच्चे शौचालय या पॉटी चेयर का उपयोग करने से मना करते हैं बस वे ही शायद तैयार न हों। शौचालय में बैठने और परिणाम देने के लिए प्रशंसा करना या पुरस्कार देना प्रभावी होता है। एक बार पैटर्न स्थापित हो जाने के बाद, हर दूसरी सफलता के लिए पुरस्कार दिया जा सकता है और फिर धीरे-धीरे बंद कर दिया जाता है।
सत्ता संघर्ष से बचना चाहिए क्योंकि वे अक्सर प्रगति में बाधा बनते हैं और माता-पिता व बच्चों के रिश्ते को तनाव में डाल सकते हैं।
पहले से टॉयलेट-प्रशिक्षित हो चुके बच्चे भी अधिक बार टॉयलेट संबंधी दुर्घटनाएं कर सकते हैं या टॉयलेट-प्रशिक्षण में हुई प्रगति को गंवाते हुए दिखाई दे सकते हैं, ऐसा जब वे बीमार हों या भावनात्मक रूप से परेशान हों या जब उन्हें अधिक ध्यान देने की आवश्यकता महसूस होती है, जैसे कि जब नया भाई-बहन आता है, तब होता है। इन स्थितियों में, माता-पिता को अपने बच्चे पर दबाव डालने से बचने की कोशिश करनी चाहिए, जब शौचालय के उपयोग का प्रशिक्षण दिया जा रहा हो तो उन्हें इनाम दिया जा सकता है और यदि संभव हो, तो ऐसे समय में अपने बच्चे की अधिक देखभाल की जा सकती है और उस पर ध्यान दिया जा सकता है।



